मीता के कार्टून आम नहीं है। क्यों कि वे साधारण नहीं है। मीता तभी कार्टून बनाती है, जब वह चाहती है, जब उसका मूड होता है। दूसरे, उसे छपास की भूख नहीं है। इसी कारण उसके कार्टून प्रिंट-मिडिया में शायद ही देखने को मिलते है।

मैंने देखना चाहा तो उसने पिटारा ही खोल दिया। एक के बाद एक अलबम वह मेरे आगे रखती गई। मैं हैरान होकर देखता चला गया। कभी मुस्काता कभी संजीद‌गी ओढ़ लेता, कभी ठहाका लगाता ।

इत्ते सारे कार्टून मैंने जिद‌गी में नहीं देखे थे। न मेरे मित्र मारियो मिरान्डा के, न सुधीर तैलंग के, न किसी अन्य कार्टूनिस्ट के । मैं गदगद हो गया। लेकिन– आखिरी कार्टून ने मुझे चारों खाने चित्त कर डाला। वह कार्टून मेरा था। फ्रेम में मैं और ढब्बू जी साथ-साथ खड़े है।

यह कार्टून आज मेरे घर की दीवार की शोभा बना है। जो भी मुलाकाती आता है, दम भर वहीं रुकता है। दूसरे ही पल उसके होंठों पर मुस्कान फैल जाती है। भीतर की जो कुलबुलाहट इज़हार करने का वह साहस नहीं कर पाता, यह मुस्कान उगल देती है- ’मियां, आज तक आप ज़माने भर के चेहरे तोड़-मोड़ रहे थे। अब देख लो अपनी नूरानी सूरत!’

14-04-15