पहली महिला कार्टूनिस्ट कहना मीता रॉय के वजूद का अवमूल्यन करना है। जीवन के कटुतम अनुभवों और संघर्ष के बीच उपजें उनके कार्टून कुछ और ही कहते हैं। महिला होने और जीवन से जूझने ने उनको एक सार्थक कार्टूनिस्ट बन पाने में मदद ही की है। जीवन को नजदीक से जाना है और यथार्थ को भोगा है। तभी तो अथक सृजन कर पाई। बस सही दिशा में अपनी अनुभूतियों का प्रवाह ही तो करना था | सो वह कर पाईं। महिला होने न होने से कोई लेना देना नहीं। वह अच्छे कार्टून बना रहीं थी या बना रहीं है यही पर्याप्त है। वह कार्टूनिस्ट ही क्या जो कठिनाइयों के बीच अपने कार्टूनों में अट्टहास न कर सके।
6-9-2015
